नास्तिकों के कुतर्क एवं इन से उपजा व्यर्थ का अपराधबोध
धर्म एवं पाखंड: द्वितीय खंड
नास्तिकों के कुतर्क एवं एवम उन से उपजा व्यर्थ का अपराधबोध:-
नमस्कार मित्रों मेरे ब्लॉग पर आप सभी का पुनः स्वागत है।
जैसा कि शीर्षक से ही मालूम पड़ता है आज हम बात करेंगे नास्तिकों की और उनके द्वारा किए गए कुतर्कों का अन्वेषण करेंगे।
नास्तिक से अभिप्राय मेरा उन व्यक्तियों के लिए है जो ईश्वर अथवा अथवा वेद दोनों की ही सत्ता को अस्वीकार करते हैं और दोनों के अस्तित्व पर और उनकी शिक्षाओं पर लगातार व्यर्थ के प्रश्न और कुतर्क करके उनको अपमानित करने का प्रयत्न करते रहते हैं जैसा कि हमेशा होता आया है जो भगवत भक्त या आस्तिक व्यक्ति यह सोच कर कि लगता है इनको वह शिक्षाएं समझ में नहीं आती या इन्हें कुछ भ्रम हो गया है ऐसा मानकर उन को समझाने का या उनसे तर्क कर के अपना पक्ष सिद्ध करने का प्रयत्न करेगा तो यह लोग उसको कुतर्क के माध्यम से चुप करा कर अपनी विजय करते हैं और ईश्वर को और वेद को अपमानित करते हैं आस्तिक व्यक्ति कुतर्क नहीं कर सकता क्योंकि वह जानता है अगर वह कुतर्क करेगा तो वह धर्म की हानि ही करेगा और उसकी इसी विवशता का नास्तिक सदैव लाभ उठाते हैं।
तर्क और कुतर्क क्या है?:-
अतः सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि तर्क और कुतर्क क्या होता है और किस प्रकार इन में भेद किया जा सकता है अर्थात उनके लक्षण क्या है।
सर्वप्रथम तर्क के लक्षणों की बात करेंगे तो तर्क का सर्वप्रमुख लक्षण यही होता है कि वह हमेशा सत्य और तथ्य पर आश्रित होता है उसमें झूठ का मिश्रण नहीं होता। परंतु कुतर्क के साथ ठीक इसके विपरीत लक्षण होते हैं कुतर्क हमेशा मिथ्या और दुराग्रह पर आश्रित होता है इसके अतिरिक्त कुतर्क को पहचानने का एक और लक्षण मिलता है कि कुतर्क को काटा नहीं जा सकता आपको केवल यह मालूम होता है कि यह जो व्यक्ति बात कह रहा है वह गलत है परंतु आप उसको काट नहीं सकते क्योंकि अगर आप उसको काटने का प्रयास करेंगे तो आपको भी झूठ का और असत्य का सहारा लेना पड़ेगा तभी आप उसको काट सकते हैं अन्यथा वह अकाट्य होगा।
इसके अतिरिक्त जब व्यक्ति तर्क पर आश्रित होता है तो इसका अर्थ यह है कि वह सत्य जानना चाहता है या सत्य पर विश्वास कर रहा है और अगर उसके तर्क गलत होंगे तो वह उनको बदलने में विश्वास रखता है। परंतु जब व्यक्ति कुतर्क करता है तो इसका अर्थ यह है कि वह पहले ही यह जानता है कि उसका पक्ष गलत है वह दुराग्रह से ग्रस्त हो स्वयं के अहंकार को पुष्ट करने के लिए और सामने वाले पक्ष को हराने के लिए हर स्थिति में हर मूल्य पर विजय उसकी हो इस बात को ध्यान में रखता है। इसी कारण से अगर आपने यह सिद्ध भी कर दिया कि उसका पक्ष गलत है तब भी वह अपना दुराग्रह नहीं छोड़ेगा और निरंतर कुतर्क पर कुतर्क करता ही जाएगा।
और बात अगर धर्म की हो तो नास्तिकों का कुतर्क तो अपने चरम पर पहुंच जाता है क्योंकि धर्म की बात जब आती है तो नास्तिक केवल दुराग्रह के वशीभूत ही नहीं होता अपितु वह द्वेष से जल रहा होता है उसका मन कुंठित होता है। और तब वह धर्म के सिद्धांतों और उसके मूल्यों पर कठोर से कठोर कुठाराघात करने का प्रयत्न करता है एक सामान्य व्यक्ति जिसकी धर्म पर आस्था है और धर्म के प्रति जिज्ञासा भी है वह अपने धर्म के प्रति जानना भी चाहता है परंतु उसके पास साधन नहीं है और समय भी नहीं है ऐसा व्यक्ति इनके कुतर्क में फंसता है और एक व्यर्थ का अपराधबोध अपने अंदर उत्पन्न करता है वह स्वयं को अपराधी मानता है धर्म के मूल्यों का पालन करने के कारण इससे दुखद और कुछ नहीं है एक व्यक्ति स्वयं को अपराधी माने उस अपराध के लिए उसने कभी किया ही नहीं
अतः आज मैं आपको ऐसे ही कुछ कुतर्कों के उदाहरण प्रस्तुत करूंगा और उनको काटने का प्रयत्न भी करूंगा इनमें सबसे प्रमुख कुतर्क आपने बहुत सुना होगा अरे इस देश में इतने भूखे और गरीब लोग हैं जिन्हें दो समय का भोजन भी मयस्सर नहीं है उस देश में लोग करोड़ों लीटर दूध पत्थर पर चढ़ा कर नष्ट कर दे रहे है। यहां पत्थर से आशय शिवलिंग से है क्योंकि भक्त और आस्तिकों के लिए तो वह स्वयं भगवान महेश्वर हैं परंतु नास्तिक व्यक्ति को एक पत्थर ही दिखाई पड़ता है नास्तिकों का यह तर्क रहता है कि यदि उस दूध को किसी गरीब को दिया जाए तो उसका पेट भर सकता है और भला ईश्वर को क्या जरूरत दूध की वह तो पूर्णकाम होते हैं उन्हें किस चीज की जरूरत है। और इस प्रकार के कुतर्कों से वह भक्तों को दुग्धाभिषेक करने से रोकते हैं और उन्हें यू जतलाते हैं जैसे वह दूध चढ़ाकर अपराध कर रहे हो।
चित्र में बाई और श्री विश्वनाथ जी का दुग्धाभिषेक और दाहिनी तरफ काशी विश्वनाथ मंदिर का स्वर्ण शिखर
नास्तिकों के कुतर्क पर हम आगे बात करेंगे सर्वप्रथम यह जान लेना आवश्यक है कि भगवान शिव को दूध क्यों चढ़ता है शिवपुराण में आपको इसका उत्तर मिल जाएगा शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को अभिषेक बहुत प्रिय है यही कारण है कि उनकी उपासना में वेद मंत्रों द्वारा उनका पंचामृत( दूध दही घृत मधु एवं शक्कर) से अभिषेक करते हैं भगवान शिव को अभिषेक कितना प्रिय है इसका अनुमान आप इसी बात से लगा सकते हैं कि उनके महामृत्युंजय स्वरुप में वह स्वयं दूध( कहीं कहीं मतान्तर से जल) से अपना ही अभिषेक करते हैं।
महामृत्युंजय स्वरूप
इनका ध्यान बहुत ही सुंदर है। जो इस प्रकार है:-
हस्ताम्भोज युगस्थ कुंभयुगलात्,उद्धृत्य
तोयं शिर:।
सिंचंतम् करयोर्युगेन दधतम्,स्वाङके
सकुम्भौ करौ।।
अक्षस्रक् मृगहस्तमंबु्जकरं मूर्धस्थ
चंद्रस्रवत्।
पीयूषोन्नमितं भजेश गिरीजं मृत्युंजयं
त्र्यंबकम्।।
अब सर्वप्रथम अगर हम इस कुतर्क का उत्तर धार्मिक दृष्टिकोण से ढूंढेंगे तो हमें एक नहीं कई धर्म ग्रंथों में इसका उत्तर बड़ी सरलता से मिल जाएगा अब उत्तर यह है स्वयं श्री भगवान ने गीता में श्रीमद् भागवत में स्पष्ट उल्लेखित किया है कि जो भी आप उन को समर्पित कर रहे हैं वह सब उन्हीं से उत्पन्न है उन पर सर्वप्रथम उन्हीं का अधिकार है अतः आप उन्हीं की वस्तु उन्हें ही समर्पित कर रहे हैं।
"यहां तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा" यही भाव पुष्ट हो रहा है और यही भाव प्रधान है अतः इसमें शंका का और कुतर्क का कोई स्थान बचता ही नहीं है।
अब आइए भौतिक (नास्तिक) दृष्टिकोण से इसको समझिए।
जैसा कि मानवतावादीयो( यहां मैं मानवता वादियों का अर्थ नास्तिक के अर्थ में ले रहा हूं) का मत है कि शिवलिंग पर चढ़ा कर नष्ट किए गए करोड़ों लीटर दूध से असंख्य गरीबों का पेट भर सकता है तो मैं उनको यह कहना चाहूंगा कि क्या कभी उन्होंने अपने निजी जीवन की विलासिता में कटौती कर के किसी गरीब की आर्थिक सहायता की है? उत्तर होगा नहीं क्योंकि इस तरह के कुतर्क करने वाले वही लोग होते हैं जो निजी जीवन में बहुत ही विलासितापूर्ण जीवन जीते हैं और स्वयं के सुख के समक्ष कभी भी दूसरों के कष्ट की परवाह नहीं करते यही लोग सामाजिक रूप से सार्वजनिक रूप से मानवता के चिंतक के रूप में ढोंग या कहूं स्वांग रचते हैं अतः ऐसे लोगों से मेरी विनम्र प्रार्थना है कृपया आप गरीबों की चिंता ना करें अगर इतनी ही चिंता है तो आप उनके लिए कुछ आगे बढ़कर करें। और रही बात इनके तर्क की यह तर्क उतना ही मजबूत है जैसे मेरा यह तर्क है जो मैं देने जा रहा हूं।
" अगर मैं कहूं कि सरकार को कई सौ करोड़ रुपए खर्च करके यह फ्लाईओवर बनाने की क्या जरूरत है या अलग से कोई ओवरब्रिज लाने की क्या जरूरत है चलने के लिए सड़क तो है ही वह कई सौ करोड़ रुपए मे सरकार कई सारे गरीबों का पेट भर सकती है।"
या "रात के समय सड़क पर इतनी सारी प्रकाश की क्यों आवश्यकता है रात में तो अधिकांश जनता सोती है उस बिजली को अगर बचाया जाए सरकार का कितना पैसा बचेगा"
अब जैसा कि आपने पढ़ा मेरे यह तर्क कितने सुदृढ़ है यह आपने अनुमान कर लिया होगा वास्तव में यह तर्क नहीं है यह कुतर्क है वैसा ही कुतर्क जैसा शिवलिंग पर दूध चढ़ाने वाला कुतर्क है इस कुतर्क को काटने के लिए आपको भी कुतर्क का ही सहारा लेना पड़ेगा आप इसे तर्क और तथ्य से नहीं काट सकते।
ऐसे ही नास्तिकों द्वारा कई अन्य कुतर्क किए गए हैं जैसे ईश्वर है तो दिखाई नहीं पड़ते? वेद तो इतने प्राचीन है उनकी आज क्या प्रासंगिकता है? आदि आदि।
अतः मेरा तो यही मानना है कि अगर आप आस्तिक हैं भगवत भक्त हैं तो इन व्यर्थ के प्रपंचों में पढ़ने का कोई मतलब ही नहीं है अगली बार ऐसे किसी नास्तिक से मिलिएगा जो इस तरह के कुतर्क आपसे करेगा तो उससे विवाद करने के बजाए उसके लिए ईश्वर से प्रार्थना कीजिएगा ईश्वर उसको सद्बुद्धि दे उसका कल्याण करें और आगे बढ़ जाइयेगा। क्योंकि ध्यान रखिएगा आप प्रेम को जीत सकते हैं दुराग्रह को नहीं।
श्रीसाम्बशिवार्पणमस्तु।
अब आइए भौतिक (नास्तिक) दृष्टिकोण से इसको समझिए।
जैसा कि मानवतावादीयो( यहां मैं मानवता वादियों का अर्थ नास्तिक के अर्थ में ले रहा हूं) का मत है कि शिवलिंग पर चढ़ा कर नष्ट किए गए करोड़ों लीटर दूध से असंख्य गरीबों का पेट भर सकता है तो मैं उनको यह कहना चाहूंगा कि क्या कभी उन्होंने अपने निजी जीवन की विलासिता में कटौती कर के किसी गरीब की आर्थिक सहायता की है? उत्तर होगा नहीं क्योंकि इस तरह के कुतर्क करने वाले वही लोग होते हैं जो निजी जीवन में बहुत ही विलासितापूर्ण जीवन जीते हैं और स्वयं के सुख के समक्ष कभी भी दूसरों के कष्ट की परवाह नहीं करते यही लोग सामाजिक रूप से सार्वजनिक रूप से मानवता के चिंतक के रूप में ढोंग या कहूं स्वांग रचते हैं अतः ऐसे लोगों से मेरी विनम्र प्रार्थना है कृपया आप गरीबों की चिंता ना करें अगर इतनी ही चिंता है तो आप उनके लिए कुछ आगे बढ़कर करें। और रही बात इनके तर्क की यह तर्क उतना ही मजबूत है जैसे मेरा यह तर्क है जो मैं देने जा रहा हूं।
" अगर मैं कहूं कि सरकार को कई सौ करोड़ रुपए खर्च करके यह फ्लाईओवर बनाने की क्या जरूरत है या अलग से कोई ओवरब्रिज लाने की क्या जरूरत है चलने के लिए सड़क तो है ही वह कई सौ करोड़ रुपए मे सरकार कई सारे गरीबों का पेट भर सकती है।"
या "रात के समय सड़क पर इतनी सारी प्रकाश की क्यों आवश्यकता है रात में तो अधिकांश जनता सोती है उस बिजली को अगर बचाया जाए सरकार का कितना पैसा बचेगा"
अब जैसा कि आपने पढ़ा मेरे यह तर्क कितने सुदृढ़ है यह आपने अनुमान कर लिया होगा वास्तव में यह तर्क नहीं है यह कुतर्क है वैसा ही कुतर्क जैसा शिवलिंग पर दूध चढ़ाने वाला कुतर्क है इस कुतर्क को काटने के लिए आपको भी कुतर्क का ही सहारा लेना पड़ेगा आप इसे तर्क और तथ्य से नहीं काट सकते।
ऐसे ही नास्तिकों द्वारा कई अन्य कुतर्क किए गए हैं जैसे ईश्वर है तो दिखाई नहीं पड़ते? वेद तो इतने प्राचीन है उनकी आज क्या प्रासंगिकता है? आदि आदि।
अतः मेरा तो यही मानना है कि अगर आप आस्तिक हैं भगवत भक्त हैं तो इन व्यर्थ के प्रपंचों में पढ़ने का कोई मतलब ही नहीं है अगली बार ऐसे किसी नास्तिक से मिलिएगा जो इस तरह के कुतर्क आपसे करेगा तो उससे विवाद करने के बजाए उसके लिए ईश्वर से प्रार्थना कीजिएगा ईश्वर उसको सद्बुद्धि दे उसका कल्याण करें और आगे बढ़ जाइयेगा। क्योंकि ध्यान रखिएगा आप प्रेम को जीत सकते हैं दुराग्रह को नहीं।
श्रीसाम्बशिवार्पणमस्तु।


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