धर्म एवं पाखंड प्रथम खंड
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
नमस्कार मित्रों आज मेरा ब्लॉग पर पहला दिन है और ब्लॉग लिखने की मेरी इच्छा बहुत पहले से थी परंतु हमेशा इस असमंजस में रहता था की किस विषय पर बात करूं और बहुत सोच विचार करके मुझे धर्म एक ऐसा विषय लगा जिस पर बात करना और लिखना पढ़ना आवश्यक है क्योंकि वर्तमान समय में इंटरनेट पर सनातन धर्म के संदर्भ में जितनी भी बातें होती है कम से कम जो मैंने देखी वह अधकचरा पढ़ाई और सुनी-सुनाई होती है धर्म का विषय बहुत सूक्ष्म होता है कोई भी ऐसे ही अपने मन से धर्म के सिद्धांत नहीं बना सकता या बदल सकता है उसके लिए धर्म का सटीक अध्ययन अत्यंत आवश्यक है अतः मैंने यह प्रयास करने का निश्चय किया है जितना हो सकेगा मैं धर्म के नाम पर फैली कुरीतियों और अंधविश्वासों से ऊपर उठकर शाश्वत धर्म क्या है जो विलुप्त हो रहा है उसकी बात करूंगा सबसे पहले मैं धर्म और पाखंड के बीच जो अंतर है उस पर बात करूंगा क्योंकि कई पुराणों में महर्षियों ने यह विशेष उल्लेख किया है कि धर्म और पाखंड के मध्य अंतर बहुत सूक्ष्म होता है अगर जरा सा भी चूक हो गई तो यह पता ही नहीं चलता कि कब हम धर्म से पाखंड के मध्य आ गए उन लोगों को जिनको पाखंड का मतलब नहीं पता है उनको मैं बताना चाहूंगा पाखंड शब्द से अर्थ इस बात से है जब हम धर्म के सिद्धांतों को हम अंधविश्वासों और अपने स्वार्थों से बदलते हैं तो वह पाखंड बन जाता है और तब वह धर्म नहीं है और हम जो धर्म मान रहे हैं वह धर्म है या पाखंड इसका निर्णय आप तभी कर पाएंगे जब आपको धर्म का सम्यक ज्ञान होगा मैं इसके लिए एक उदाहरण देना चाहूंगा आप में से बहुतों ने इसे अपने आस पास देखा होगा जैसे अरे फलाह व्यक्ति पर माता जी की सवारी आ गई या स्वयं माता आ गई फिर उसे उस व्यक्ति का या उस महिला का पूजन होता है उसका बड़ा सम्मान होता है वह महिला या व्यक्ति सबको आशीर्वाद देता है और सब उससे डरते हैं। परंतु यह संभव नहीं मनुष्य का शरीर इतना सामर्थ्यवान नहीं है की जगत जननी उस पर आवे इसको इस तरह समझना होगा मां दुर्गा इस सृष्टि की सर्वोच्चतम बिंदु पर है और हम वहां से बहुत नीचे है इस सृष्टि में जो कुछ भी है सब उन्हीं से उत्पन्न होता है और उन्हीं में समाहित हो जाता है कई जगह पर स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि वह धरती से भी अधिक बोझ अपने ऊपर सहती है उनके तेज की उनके ओजस्विता कि इस पूरे ब्रह्मांड में कहीं कोई तुलना नहीं है फिर वह मनुष्य के नाशवान और कमजोर शरीर पर भला क्यों आए मैं अपनी बात को सिद्ध करने के लिए एक कथा जरूर सुनाऊंगा जिसे पढ़कर आपको विश्वास हो जाएगा यह कथा है स्वामी रामकृष्ण परमहंस की जो उन्होंने स्वयं उन्होने अपने शिष्यों को सुनाई थी उनकी जीवनी में इसका जिक्र मिलता है बात उनके किशोरावस्था की है जब उनका नाम गदाधर था उनके अंदर बचपन से ही महापुरुषों के लक्षण मौजूद थे उन्होंने बचपन से ही ध्यान लगाने एवं साधना में महारत हासिल कर ली थी।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस
जगदंबा की भक्ति में उनका बहुत समय बीतता था। एक बार की बात है स्वामी रामकृष्ण परमहंस प्रतिदिन कोलकाता में काली जी के मंदिर में दर्शन करने जाते थे वहां पर दिन माता से प्रत्यक्ष दर्शन देने की प्रार्थना करते थे और कई दिन प्रार्थना करते करते एक दिन उनकी प्रार्थना पूरी हुई। उस दिन नित्य की तरह वह मंदिर में गए और मंदिर में प्रवेश करते ही उन्होंने माता का दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया तो उन्होंने देखा कि मानो महाकाली की मूर्ति सजीव हो वह मूर्ति हिल रही थी जगदंबा की मूर्ति में उनके हाथ और पैर हिल रहे थे ऐसा उन्होंने देखा और यह देखते ही वह जमीन पर गिर पड़े और उन्हें लगा जैसे उन पर कई मन वजन रख दिया गया हो और और वह उस वजन से दब गए हो तब उन्होंने घबराकर बड़े ही करूण शब्दों से माता से प्रार्थना की कि माता रक्षा कीजिए तब उन्हें मां की आवाज सुनाई पड़ी उन्होंने कहा तुम मुझसे बार-बार दर्शन प्रार्थना कर रहे थे यह उसी का परिणाम है मैंने तुम्हारी इच्छा पूर्ण करने का प्रयास किया और देखो तुम्हारा क्या हाल हो गया बेटा इस भौतिक शरीर से मेरा दर्शन करना संभव नहीं है मेरा दर्शन केवल योग साधना से ही संभव है अतः तुम केवल योग साधना से ही मेरा दर्शन प्राप्त कर पाओगे। और इसके पश्चात स्वामी रामकृष्ण परमहंस सामान्य हो गए और मूर्ति फिर से स्थिर हो गई इसके पश्चात आजीवन स्वामी रामकृष्ण परमहंस में ध्यान योग के द्वारा ही मां के दर्शन किए।
माता महाकाली कोलकाता
अब यहां यह बात ध्यान देने योग्य है जरा सा दर्शन देने की बात हुई तो स्वामी रामकृष्ण परमहंस जैसे महापुरुष जमीन पर गिर गए तो हम कैसे यह मान लें कि वह मां किसी ऐसे व्यक्ति पर प्रत्यक्ष आ जाएं जिसका साधना या तपस्या से दूर दूर तक कोई संबंध ना हो और एक सबूत और है जिससे मैं यह साबित कर सकता हूं यह पूरी तरह अंधविश्वास है मां समस्त विद्या की अधिष्ठात्री है। समस्त विद्या उन्हीं से उत्पन्न होकर उन्हीं में समाहित हो जाती हैं। उनका आवेश किसी के ऊपर आने पर आवेशित व्यक्ति पर किसी किस्म का कोई लक्षण प्रकट नहीं होता। और न ही कोई ऐसा लक्षण नहीं दिखता है जिससे यह माना जाए कि स्वयं माता इसके ऊपर है। ना ही उसके शरीर में कोई प्रकाश या तेज उत्पन्न होता है। जिस प्रकार की वाणी का इस्तेमाल करता है मां वैसी वाणी प्रयोग नहीं करती और भी ऐसे बहुत कारण है जिससे मैं इसे अंधविश्वास मानता हूं बहुत लोग यह भी कहते हैं इसके बचाव में की उस व्यक्ति के आशीर्वाद से मेरा बड़ा कल्याण हुआ है पर कोई भी तर्कशील व्यक्ति यह जानता है इन बातों में कितनी सच्चाई है अंत में अपनी बात मैं समाप्त करना चाहूंगा यह कह कर मां की उपासना कीजिए जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति कीजिए मां का आंचल प्राप्त कीजिए और ऐसे धर्म के शत्रुओं से दूर रहिए और स्वयं को अधर्म से बचाइए. और एक बात अगर आपके मन में अगर कोई और प्रश्न धर्म के संदर्भ में हो जिसका उत्तर आप जानना चाहते हो तो कृपया comment box mein लिखे। धन्यवाद
स्वामी रामकृष्ण परमहंस
जगदंबा की भक्ति में उनका बहुत समय बीतता था। एक बार की बात है स्वामी रामकृष्ण परमहंस प्रतिदिन कोलकाता में काली जी के मंदिर में दर्शन करने जाते थे वहां पर दिन माता से प्रत्यक्ष दर्शन देने की प्रार्थना करते थे और कई दिन प्रार्थना करते करते एक दिन उनकी प्रार्थना पूरी हुई। उस दिन नित्य की तरह वह मंदिर में गए और मंदिर में प्रवेश करते ही उन्होंने माता का दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया तो उन्होंने देखा कि मानो महाकाली की मूर्ति सजीव हो वह मूर्ति हिल रही थी जगदंबा की मूर्ति में उनके हाथ और पैर हिल रहे थे ऐसा उन्होंने देखा और यह देखते ही वह जमीन पर गिर पड़े और उन्हें लगा जैसे उन पर कई मन वजन रख दिया गया हो और और वह उस वजन से दब गए हो तब उन्होंने घबराकर बड़े ही करूण शब्दों से माता से प्रार्थना की कि माता रक्षा कीजिए तब उन्हें मां की आवाज सुनाई पड़ी उन्होंने कहा तुम मुझसे बार-बार दर्शन प्रार्थना कर रहे थे यह उसी का परिणाम है मैंने तुम्हारी इच्छा पूर्ण करने का प्रयास किया और देखो तुम्हारा क्या हाल हो गया बेटा इस भौतिक शरीर से मेरा दर्शन करना संभव नहीं है मेरा दर्शन केवल योग साधना से ही संभव है अतः तुम केवल योग साधना से ही मेरा दर्शन प्राप्त कर पाओगे। और इसके पश्चात स्वामी रामकृष्ण परमहंस सामान्य हो गए और मूर्ति फिर से स्थिर हो गई इसके पश्चात आजीवन स्वामी रामकृष्ण परमहंस में ध्यान योग के द्वारा ही मां के दर्शन किए।
माता महाकाली कोलकाता
अब यहां यह बात ध्यान देने योग्य है जरा सा दर्शन देने की बात हुई तो स्वामी रामकृष्ण परमहंस जैसे महापुरुष जमीन पर गिर गए तो हम कैसे यह मान लें कि वह मां किसी ऐसे व्यक्ति पर प्रत्यक्ष आ जाएं जिसका साधना या तपस्या से दूर दूर तक कोई संबंध ना हो और एक सबूत और है जिससे मैं यह साबित कर सकता हूं यह पूरी तरह अंधविश्वास है मां समस्त विद्या की अधिष्ठात्री है। समस्त विद्या उन्हीं से उत्पन्न होकर उन्हीं में समाहित हो जाती हैं। उनका आवेश किसी के ऊपर आने पर आवेशित व्यक्ति पर किसी किस्म का कोई लक्षण प्रकट नहीं होता। और न ही कोई ऐसा लक्षण नहीं दिखता है जिससे यह माना जाए कि स्वयं माता इसके ऊपर है। ना ही उसके शरीर में कोई प्रकाश या तेज उत्पन्न होता है। जिस प्रकार की वाणी का इस्तेमाल करता है मां वैसी वाणी प्रयोग नहीं करती और भी ऐसे बहुत कारण है जिससे मैं इसे अंधविश्वास मानता हूं बहुत लोग यह भी कहते हैं इसके बचाव में की उस व्यक्ति के आशीर्वाद से मेरा बड़ा कल्याण हुआ है पर कोई भी तर्कशील व्यक्ति यह जानता है इन बातों में कितनी सच्चाई है अंत में अपनी बात मैं समाप्त करना चाहूंगा यह कह कर मां की उपासना कीजिए जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति कीजिए मां का आंचल प्राप्त कीजिए और ऐसे धर्म के शत्रुओं से दूर रहिए और स्वयं को अधर्म से बचाइए. और एक बात अगर आपके मन में अगर कोई और प्रश्न धर्म के संदर्भ में हो जिसका उत्तर आप जानना चाहते हो तो कृपया comment box mein लिखे। धन्यवाद
श्रीजगदंबाअर्पणमस्तु
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप


Shi kha sir ji.....
जवाब देंहटाएं